हज़ार घड़ियां फुरक़त की गवारा होंगी,
बस इन्तज़ार को कोई यक़ीन दे जाओ।
अब हकीक़त से न बहलेगी तमन्ना मेरी,
इसके ख़ातिर इक सपना हसीन दे जाओ।
उम्मीद इक दिलासा और इक सपना,
इन्ही सहारों पर दीवाने जिया करते हैं।
आने वाले दिनो के रेशमी पलों से ही,
वो हर जख़्म ज़िन्दगी का सिया करते हैं।
वीरान ज़िन्दगी की मेरी राहों में
ख़्वाब की कलियों से महकी ज़मीन दे जाओ।
अब हकीक़त से........................
जला के बीते लम्हों को अपनी आँखों में
किसी तस्वीर की आरती उतार लेते हैं
सब्र होता है बहुत दीद के दीवानों में,
एक वादे पर सदियाँ गुज़ार देते हैं।
दिल के दीवारों मे तस्वीर कोई खिंच जाए,
मेरे लिए तो कोई पल रंगीन दे जाओ।
अब हकीकत से न बहलेगी तमन्ना मेरी,
इसके ख़ातिर इक सपना हसीन दे जाओ।
Monday, October 13, 2008
हजार घड़ियाँ फुरक़त की
Tuesday, September 9, 2008
रुकते अगर...
हम दूर थे हमीं से, हमको ना थी खबर,
जो खुद को तलाशने चले, तो तू खड़ा मिला।
सब हसरतों को दफ्न कर दिया था जहां पर,
इक दरख़्त प्यारा सा वहीं खिला मिला।
हम सच को ढूंढ़ते फिरे लफ्जों के नगर में,
खामोशियों के गांव में उसका निशां मिला।
रुकते अगर तो मजिलें नसीब भी होतीं,
चलने की धुन में हमको फक़त रास्ता मिला।
ये दर्द है अजीब हमें और क्या कहें,
दोनों जहां लुटा के चैन स्वर्ग सा मिला।
Wednesday, February 13, 2008
झूठे सपनों के रंग

जब मन के सब सुख दूर हुए,
हम जीने को मजबूर हुए,
हम जीने को मजबूर हुए,
तब से झूठे सपनों का रंग
आँखों में भरना सीख गए।
मेरा मन का जो अपना था,
वो प्यारा सा इक सपना था,
सच हुआ मगर केवल छल था
वो प्यारा सा इक सपना था,
सच हुआ मगर केवल छल था
जैसे खुशियों का इक पल था।
जब सच ने हर सपना लूटा,
और हर वादा हुआ झूठा,
और हर वादा हुआ झूठा,
तब से इन चांद सितारों से
हम बातें करना सीख गए।
मन मेरा प्रियतम का घर था,
पावन मंदिर सा सुंदर था,
इक दिन फिर हुआ ना जाने क्या
पावन मंदिर सा सुंदर था,
इक दिन फिर हुआ ना जाने क्या
ना मंदिर था ना ईश्वर था।
जब देव ने देवालय तोड़ा,
विश्वास ने भी दामन छोड़ा,
तब से राहों के पत्थर की
हम पूजा करना सीख गए।
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