Saturday, January 3, 2009

तेरे नश्वर जग पर बलिहारी।


मेरे प्रभु मेरे परमेश्वर तेरे नश्वर जग पर बलिहारी।

अपने हाथों से रोपे हुए पौधे में पहली बार खिली,
नन्ही कलियों को देख जगी आँखो की चमक पर बलिहारी

मेरे प्रभु..........
ढलते सूरज की किरणों से नीरस बादल रंग जाते है,
पश्चिम की क्षितिज में फैली हुई रंगों की दमक पर बलिहारी।

मेरे प्रभु..........

जलती उड़ती भटकी धूलें जब जल में घुल घुल जाती हैं
पहली बारिश में उठती हुई सोंधी सी महक पर बलिहारी

मेरे प्रभु मेरे परमेश्वर तेरे नश्वर जग पर बलिहारी।


Saturday, October 18, 2008

काश...तुम सपना नही यथार्थ होते....

काश ! .......कभी ऐसा हो.....

हम रेशमी धागों से रुमाल पर तुम्हारा नाम टाँके..

तुम्हारे लिए फूल चुनकर लाँए और माला गूँथे..

काश ! .....कभी खिड़की पर देर तक बैठकर तुम्हारी राह देंखे..

....कभी यूँ ही अकेलें मे मुस्कायेँ......

कभी ये निगाहें आसमान पर टिकी रह जाएं

काश! ......ऐसा होता......जिन्दगी के कुछ पल तुम्हारे लिए होते
काश! ........................

तुम सपना नही यथार्थ होते.......



Wednesday, October 15, 2008

आँखों मे था कोई रंगीन सा पर्दा

दिल मे दहकते शोले दहकते चले गए।
हम अपनी बेखुदी पे ही हँसते चले गए ।

रेशम के तार से बुन रहे थे कोई ख्वाब,
वो जाल कैसे बन गए, फंसते चले गए।

इक आह सी निकली थी, दम घुटने लगा था,
हम ग़म के बाजुओं मे कसते चले गए।

फूलों भरी राहों में छिपे थे हजारों खार,
पाँवों से लहू बन के रिसते चले गए।

आँखों में था कोई रंगीन सा पर्दा,
पाँवों को कैसे रास्ते दिखते चले गए।

हर बार उजड़ता रहा ये दिल का बसेरा
हर बार ईट नीव की रखते चले गए।